भारत और एआई: छूटी हुई ट्रेन की कहानी

आज देश के खाली प्लेटफार्म पर खड़े नौजवान पूछ रहे हैं- हमारी एआई ट्रेन क्यों छूटी? लेकिन शायद वो यह नहीं जान पाए या नहीं बता पाए कि भारत के विकास की बहुत सी ट्रेनें पहले ही छूट चुकी हैं। और देखा जाए तो मुल्क में एआई की ट्रेन बनी ही नहीं, उसके प्लेटफार्म पर आने और छूटने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँ, दुनिया के एआई के प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन वाकई छूट चुकी है।

अब, पहली या दूसरी ट्रेन बनने या प्लेटफार्म पर आने तक, दुनिया विकास की मंजिल पर बहुत आगे निकल चुकी होगी, जिसे पकड़ पाना नामुमकिन हो जाएगा। दिखावे की गाड़ियां और बर्बादी की राह जिस तरह भारतीय रेल को बर्बाद करके बुलेट और वंदे भारत टाइप ट्रेनों के दिखावटी तमाशे चल रहे हैं, वैसे ही अब बहुत से खेल-खिलौने भी एआई के नाम पर मन बहलाने और बेवकूफ बनाने के लिए बनते रहेंगे और चलते रहेंगे।

सतत विकास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। भारत ने ग्रामीण विकास के लिए खेती उन्नयन और उस पर आधारित लघु एवं हस्त कौशल का गांधीवादी मॉडल चुना। दुनिया के साथ चलने के लिए नेहरू का औद्योगिक विकास का मॉडल अपनाया, जो इमर्ज होकर धीरे-धीरे नया रूप ले रहा था। इस सब में पब्लिक सेक्टर इंजन की तरह काम कर रहा था। लेकिन कथित “नई आज़ादी” के मौजूदा दौर में यह सारी व्यवस्था पटरी से उतार दी गई है।

नीतिगत दृष्टि का अभाव

पूरी दुनिया के योजनाकार, नीति-नियंता, सरकार और नेता अपने-अपने देशों में विकास की दौड़ में अपनी जनता, अपने समाज और देश को न केवल बाहरी दबाव से बचाते हैं, बल्कि नवीनतम तकनीक से आगे बढ़ाते हैं। यही नीति ज़रूरी होती है।

यहां तो सरकार सारा दबाव जनता पर डाल रही है। ऐसा लगता है जैसे सरकार अपनी जनता से ही युद्ध कर रही हो। जनता की सुविधा, विकास और आज़ादी का कोई मायने नहीं रह गया- फिर चाहे वह औद्योगिक क्षेत्र हो, संचार क्रांति हो या फिर कृत्रिम बौद्धिकता (AI)।

स्वदेशी का नारा लगाकर अधोगामी विचारधारा से उन्नति नहीं हो सकती। याद रखें- औद्योगिक क्रांति और संचार क्रांति का विरोध करने वाले ही इस समय भाग्य विधाता बने हुए हैं। जो दावे तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन अमल के मामले में शून्य हैं। इसी मानसिकता ने विकास के कॉन्सेप्ट को धुंधला कर दिया है।

एआई की ट्रेन बनी क्यों नहीं?

अब सवाल यह है कि हमारी एआई की ट्रेन बनी क्यों नहीं? हाँ, अगर बन गई तो प्लेटफार्म पर पहुँची क्यों नहीं? अगर प्लेटफार्म पर नहीं थी तो कैसे छूट गई? एआई की ट्रेन धड़ल्ले से चलाने के लिए मुल्क के पास सब कुछ था और है- बस नीति, दृष्टि, संकल्प और समन्वय की ज़रूरत थी।

लेकिन पिछले 10-11 सालों में क्या हुआ? 2014 में नई मोदी सरकार का श्रीगणेश नकारात्मक सोच से हुआ। आते ही कहा गया कि पिछले 70 सालों में कोई विकास नहीं हुआ और कांग्रेस सरकारों ने देश को लूट लिया।

संस्थाओं का पतन और शोध का ह्रास

जब सरकार चलाई जाने लगी तो सरकारी लूट कैसी होती है, यह साफ दिखा। सरकारी संस्थाओं को बदनाम किया गया, उन्हें बेच डाला गया, टॉप रिसर्च संस्थानों और शैक्षिक संस्थानों के खिलाफ नफरती मुहिम चलाई गई।

स्कॉलर्स और शोधकर्ताओं को साइडलाइन किया गया, जिससे विकास का जो मॉडल और माहौल बना हुआ था, वह टूट गया। पूंजीवादी व्यवस्था के देशों में निजी उद्योग पारदर्शिता से काम करते हैं। उनकी सारी प्रक्रियाएं पहले से ही तय होती हैं, जो भारत जैसे विकासशील देश में अगले दशकों तक संभव नहीं दिखतीं। इसलिए यहां पूंजीपतियों की क्षमता और ईमानदारी — दोनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

पिछले दो-तीन दशकों में खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर भारतीय पूंजीपतियों ने अपनी विश्वसनीयता बढ़ाई नहीं, बल्कि खोई है। अगर भारतीय पूंजीपति वाकई में सक्षम होते तो चीन और दूसरे देशों में हुई संचार और बौद्धिक क्रांति की तरह देश में योगदान देते, न कि सरकारी संसाधनों को लूटते। अगर ऐसा हुआ होता तो शायद भारत में भी चीन की DeepSeek जैसी एआई पहल हो गई होती।

निवेश की सच्चाई

न तो वर्तमान भारतीय सरकार और न उनके करीबी पूंजीपतियों ने एआई में कोई ठोस काम किया, न माहौल बनाया। ज़रा सोचिए — पिछले सालों में किन भारतीय कंपनियों के बोर्डरूम में एआई पर गंभीर चर्चा हुई? किसने इसके लिए फंड बनाया? ऊपर से ही शून्यता है तो नीचे तक भी शून्य ही शून्य है। एआई पर सरकारी या निजी भागीदारी की कोई ठोस सार्वजनिक सूचना, चर्चा या योजना पिछले वर्षों में सामने नहीं आई।

दुनिया बनाम भारत का एआई निवेश

एआई के विकास के साथ बजट और फंड का सवाल भी आता है। अमेरिका ने एआई में 1.66 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया था। अमेरिका एआई रिसर्च, पेटेंट और स्टार्टअप में नंबर 1 है, और उसके पास 5 प्रमुख एआई एप हैं।

अमरीकी समाज में बहुत पहले ही एआई का कॉन्सेप्ट और एडाप्टेबिलिटी फैल चुकी है। हमारे यहां सार्वजनिक विमर्श में जो हुआ और जो सड़क-छाप तरीके से हो रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है।

चीन ने 1 लाख करोड़ रुपये का एआई में निवेश किया था। उसका DeepSeek आते ही तहलका मचा चुका है। चीन एआई पेटेंट में लगभग अमेरिका के बराबर है। DeepSeek सबसे सस्ता एआई मॉडल है। ऐसी संभावना है कि सात-आठ सालों में चीन एआई में नंबर 1 होगा। चीन के कारोबार, उद्योग, शिक्षा और चिकित्सा—यानि पूरे समाज में एआई तेज़ी से फैल रहा है।

भारत की स्थिति

अब ज़रा भारत पर नज़र डालिए। यहाँ तो “इंडिया” कहने पर भी आपत्ति जताई जा रही है और मूर्खतापूर्ण ढंग से एआई को अमेरिका-भारत से जोड़ दिया गया है।

मोदी सरकार ने एआई में 200 करोड़ से भी कम—करीब 170 करोड़ रुपये—का निवेश किया है। अमेरिका के 1.5 लाख करोड़ और चीन के 1 लाख करोड़ की तुलना में यह रकम देहाती कहावत के मुताबिक “थूक में सत्तू घोलने” जैसी है।

कहा तो गया था कि 2200 करोड़ रुपये का निवेश होगा, जो कि वैसे भी बहुत कम था और जिससे कोई बड़ी तकनीकी उपलब्धि नहीं होने वाली थी। लेकिन हुआ क्या? केवल 170 करोड़ रुपये। इन हालात से साफ है कि भारत में इस वक्त एआई जैसी कोई चीज़ मौजूद ही नहीं। अगर यूएस के एआई टूल न हों तो हमें पता ही न चले कि एआई है क्या।

सऊदी अरब का उदाहरण

यह बड़ी हैरानी की बात है कि सऊदी अरब ने अपने लिए एआई टूल बना लिया है। उसकी 46 शीर्ष कंपनियां एआई पर काम कर रही हैं। और तो और, वह अपने निर्माणाधीन NEOM को एक AI-Centric Smart City के रूप में बना रहा है।

इसमें शहर का डेटा-आधारित संचालन होगा- इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रैफिक, ऊर्जा वितरण, जल प्रबंधन, और कचरा निपटान- सब कुछ रियल-टाइम डेटा और एआई द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।

170 किलोमीटर लंबे और केवल 200 मीटर चौड़े इस शहर की नागरिक सेवाएं — जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और अन्य सरकारी सेवाएं — एआई और ऑटोमेशन पर आधारित होंगी, जिससे ज़रूरतों का predictive management होगा। यानी, एआई पहले से अनुमान लगा लेगा कि कब और कहां किस चीज़ की आवश्यकता होगी।

एआई और ऑटोमेशन की सुविधाएं

इस शहर में:

डिलीवरी ड्रोन

स्वचालित परिवहन

एआई-संचालित सुरक्षा निगरानी

रोबोटिक हेल्पर

— सब कुछ शामिल होगा।

शहरों का सबसे चुनौतीपूर्ण काम- पर्यावरण प्रबंधन, ऊर्जा मांग का अनुमान, मौसम और जलवायु के अनुसार फौरी इंतज़ाम, प्रदूषण नियंत्रण- सब एआई-आधारित होगा। साथ ही सभी संसाधनों का उच्चतम उपयोग किया जाएगा।

इसकी पावर ज़रूरत पूरी करने के लिए पवन और सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा।

भारत में आधारभूत तैयारी का अभाव

इधर भारत की हालत देख लीजिए- अभी तक आधार कार्ड की सभी सूचनाएं भी अपडेट नहीं हैं। ऐसी कोई परेशानी-मुक्त और सरल व्यवस्था नहीं बनी जो सूचनाओं का मानकीकरण कर सके।

देश में एआई-आधारित योजनाएं कितनी हैं, गिनना मुश्किल नहीं- ज़्यादातर काम वही संस्थाएं कर रही हैं जो नेहरू/कांग्रेस काल में बनी थीं। 2020 से 2025 तक इस सेक्टर में भले 40% की वृद्धि हुई है, लेकिन यह प्रभावकारी नहीं है।

एआई तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है — बड़ा और पर्याप्त बजट, रिसर्च संस्थानों में लगातार एआई पर शोध कार्यक्रम, तकनीकी उन्नयन, डेटा सुरक्षा, पावर सप्लाई, चिप्स और सेमीकंडक्टर की उपलब्धता। भारत में ये ज़रूरी चीजें लगभग नदारद हैं। जो है, वह बस अनलिमिटेड बकवास।

ऊर्जा और पावर की चुनौती

सिर्फ़ पावर की बात करें तो हम कहीं नहीं ठहरते। AI डेटा सेंटर्स बनाने और उन्हें मेंटेन करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। उदाहरण के तौर पर, यूरोप में 2026 तक AI के लिए उतनी बिजली की ज़रूरत होगी, जितनी जापान जैसे विकसित देश की एक साल की ऊर्जा खपत के बराबर है — और वह भी अभी उपलब्ध नहीं है।

यूरोप में फ्रांस तकनीकी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण देश है, जो अपनी ज़रूरत का 70% न्यूक्लियर ऊर्जा से पूरा करता है। फिर भी वह AI डेटा सेंटर के लिए पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है। फ्रांस को अपनी पावर की कमी पूरी करने के लिए नया न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाना पड़ेगा।

यूएई, जो तेल और गैस से ऊर्जा पैदा करने वाला देश है, ने दो साल पहले रूस के सहयोग से न्यूक्लियर प्लांट स्थापित किया है, ताकि AI डेटा सेंटर और चिप्स बनाने की फैक्ट्री खड़ी कर सके।

भारत की मौजूदा स्थिति

भारत में हालात यह हैं कि अभी नागरिकों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है। हिंदी पट्टी के गांव तो छोड़िए, शहर भी पावर कट से परेशान हैं। ऐसी हालत में AI के लिए बिजली मिलने की कल्पना करना भी मुश्किल है।

परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने की कोई स्पष्ट योजना सार्वजनिक विमर्श में नहीं है। और अगर योजना बने भी, तो उसे पूरा होने में कम-से-कम सात साल लगेंगे- यह भी पक्का नहीं कि वह बीच में किसी राजनीतिक या कानूनी झमेले में न फँसे।

सॉफ़्टवेयर से ज़्यादा हार्डवेयर की ज़रूरत

अभी स्थिति यह है कि सॉफ़्टवेयर से ज़्यादा ज़रूरत हार्डवेयर की है। सिर्फ़ “AI, AI” रटने से कुछ हासिल नहीं होगा — यह ट्रांसफ़ॉर्मेशन का दौर है। अगर यह मौक़ा चूक गए, तो 100 साल पीछे चले जाएँगे। अगर सेमीकंडक्टर और Graphics Processing Units (GPU) नहीं होंगे, तो AI कैसे बनेगा और बनाएगा कौन?

भारत के लिए संभावित रास्ता

भारत में नेहरूजी के रास्ते पर AI पावर बनने का मौका है। IIT, IISc और अन्य शीर्ष संस्थानों से 50 विशेषज्ञों की टीम बनाकर उन्हें ज़िम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए थी। भारत के पास तकनीकी विद्वानों और संस्थानों की कोई कमी नहीं है।

अमेरिका में जितनी सैलरी मिलती है, उतनी ही सैलरी इन विशेषज्ञों को दी जानी चाहिए — बिना उचित भुगतान के कोई भी देशभक्ति के नाम पर काम नहीं करेगा। सही मायने में सैलरी एक इन्वेस्टमेंट है।

AI का बजट कम-से-कम 50,000 करोड़ रुपये होना चाहिए, और उसके लिए दो साल की टाइमलाइन तय होनी चाहिए। साथ ही, संघ और संघियों या अडानी-अंबानी जैसे घटिया व्यापारी वर्ग को तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों के AI प्रोजेक्ट से दूर रखा जाए।

वैश्विक निवेश की तुलना

अगले दो सालों में, यानी 2027 तक, वैश्विक पोजिशनिंग बदलने वाली है।

अमेरिका 42 लाख करोड़ रुपये, चीन 12 लाख करोड़ रुपये का निवेश मंज़ूर कर चुका है। वहीं भारत में मोदी-मीडिया 4 लाख करोड़ का गीत गा रहा है, जबकि सरकार ने वास्तव में केवल 2200 करोड़ रुपये दिए हैं — दुनिया इस पर हँस रही है।

DeepSeek का उदाहरण

चीनी DeepSeek AI कंपनी के मालिक लियांग हेंगफ़ेंग ने अमेरिका से बहुत कम निवेश में AI कंपनी खड़ी करके पूरी दुनिया को हिला दिया, जिससे सब डरे हुए हैं।

लियांग ने 2021 में NVIDIA से 10,000 H800 चिप्स खरीदी और चीनी विश्वविद्यालयों के प्रतिभाशाली PhD प्रोफ़ेशनल्स को अमेरिकी सैलरी के बराबर भुगतान देकर भर्ती किया। हालाँकि अमेरिका ने उस पर पाबंदियां लगाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वह नाकाम रहा। आज ऐप स्टोर पर DeepSeek शीर्ष पर है।

भारतीय टैलेंट- वास्तविकता बनाम गर्व

इस पर गर्व किया जाता है कि अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों में भारतीयों की भरमार है। गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला, IBM के अरविंद कृष्णा, एप्पल के COO सबीह खान, एडोबी के शांतनु नारायण — और दर्जन भर भारतीय CEO अमेरिकी कंपनियों के शीर्ष पदों पर हैं।

गर्व यह भी जताया जाता है कि अमेरिकी सिलिकॉन वैली का ग्लैमर भारतीय टेक्नोक्रेट्स के बल पर है। लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिकी AI इंडस्ट्री को चुनौती देने वाला DeepSeek जैसा क्रांतिकारी काम भारत से नहीं, बल्कि चीन से आया है।

2022 में अमेरिका के शीर्ष AI पेशेवरों में 38% चीनी और केवल 7% भारतीय थे।

अगर अमेरिकी कंपनियों में शीर्ष पदों पर भारतीयों के होने से भारत को कोई वास्तविक फ़ायदा होता, तो DeepSeek भारत में पैदा होता, न कि चीन में।

छूटी हुई ट्रेनें

इस तरह, भारत और भारतीय वैश्विक स्तर पर AI प्लेटफ़ॉर्म की छूटी हुई ट्रेन पकड़ने में नाकाम रहे। यह छूटी ट्रेन कब मिलेगी, पता नहीं। देश में विकास और भविष्य की बहुत सी एक्सप्रेस ट्रेनें पहले ही छूट चुकी हैं। लेकिन माहौल ऐसा बनाया गया है कि वंदे भारत की चमक-दमक में लोगों को कृत्रिम, दिखावटी दुनिया में घुमाया जा रहा है, और रही-सही ट्रेनों का भी बेड़ा ग़र्क किया जा रहा है।

हिंदी पट्टी और मीडिया में जो चल रहा है, वह सीधे-सीधे बर्बादी की राह है।

(इस्लाम हुसैन गांधीवादी कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल काठगोदाम में रहते हैं।)

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